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राहु-केतु का प्रभाव: ज्योतिष में छाया ग्रहों का महत्व

राहु और केतु वैदिक ज्योतिष के रहस्यमय छाया ग्रह हैं। ये वास्तव में ग्रह नहीं बल्कि चंद्रमा की कक्षा और क्रांतिवृत्त के काल्पनिक प्रतिच्छेदन बिंदु हैं, जिन्हें खगोलीय नोड्स (Nodes) कहते हैं।

राहु और केतु क्या हैं?

पौराणिक कथाओं के अनुसार, समुद्र मंथन के समय स्वर्भानु नामक असुर ने देवताओं का वेश धारण करके अमृत पी लिया। भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से उसके दो टुकड़े किए — सिर वाला भाग राहु और धड़ वाला भाग केतु कहलाया।

राहु का प्रभाव

राहु भ्रम, छल, अचानक परिवर्तन और अपरंपरागत सोच का प्रतीक है।

  • सकारात्मक: नवाचार, तकनीक, विदेश यात्रा, राजनीति में सफलता
  • नकारात्मक: भ्रम, लत, छल-कपट, अचानक हानि

केतु का प्रभाव

केतु आध्यात्मिकता, मोक्ष और अतीत के कर्मों का प्रतिनिधित्व करता है।

  • सकारात्मक: आध्यात्मिक उन्नति, अंतर्ज्ञान, शोध, वैराग्य
  • नकारात्मक: अलगाव, रहस्यमय बीमारियां, भ्रम

राहु-केतु महादशा

विंशोत्तरी दशा पद्धति में राहु की महादशा 18 वर्ष और केतु की 7 वर्ष की होती है।

2025-2026 में राहु-केतु का गोचर

वर्तमान में राहु कुंभ राशि में और केतु सिंह राशि में विराजमान है। इससे कुंभ और सिंह राशि के जातकों पर विशेष प्रभाव पड़ रहा है।

राहु-केतु के उपाय

  • राहु के लिए: रोज काले तिल, गोमेद रत्न, "ॐ रां राहवे नमः" का जाप
  • केतु के लिए: लहसुनिया रत्न, "ॐ कें केतवे नमः" का जाप
  • दोनों के लिए: नागपूजा, शनिवार का व्रत

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